अछूत ------------------------ श्वेद का, जीया हुआ जीवन होता है। स्पर्श किये हुए वायु में कर्म का सुगंध होता है। श्रम की कहानियाँ,किस्से,कौशल और पराक्रम सृष्टि का कायम रखती है प्रवाह। शीतल मन से तातल तन से क्षुधित विश्व का रखता आया एक वही परवाह।
विस्तृत गगन पर हमारा सूर्य जोहता रहा बाट तुम्हारी तलवार वाली किताबें कब करे बंद अपने पृष्ठ। पर, बेहुदा खोल रखता है पलकों के नीचे मेरी रोटी गोल न बने यह देखने। व्यवस्थित न होने देना जिस कौम की नीयत है समाज का वह हिस्सा अछूतेपन के कोढ़ से ग्रस्त पतनोन्मुख हो,यह वरदान है।
अछूत कविताएँ बोलने आयी है बोलें अपने अछूतेपन को कुचलें। कानून, व्यवस्था के लिए कायम हुई है रखवालों का इसे बपौती मान लेना अव्यवस्था को कायम करना है। जैसे अछूत को अछूत रखने की कवायद। --------------------------------------------------16826
बड़ा हो जाना छोटी उम्र में --------------------------------- बड़ा हो जाना छोटी उम्र में। मरते रहना है तमाम वक्त। आक्रमण करते रहना है उम्र के खण्ड-खण्ड अस्तित्व पर क्रोध के शस्त्रागार से निकले घृणा से। छोटी उम्र में हासिल कर लेना बड़ों का सच अपना सच खो देना है। छोटी सी उम्र में बड़े दरख्तों को काटने कुल्हाड़ी से हो जाना प्रस्तुत डरकर क्षुधा से मेरा बड़ा हो जाना है। छोटी उम्र में मुझे बनने देना बड़ा है सारी जिन्दगी मुझे छोटा रखने का षडयंत्र। सामाजिक संवेदनाओं का अभाव सभ्यता का बौनापन है यह बौनापन छीनता रहा है तमाम उम्र मेरी उम्र। -------------------------------------------------24726
आलमारी --------------------------- लोग खरीदते हैं लोहे की मजबूत अलमारियाँ। सहेज कर रखने के लिए वर्तमान का अतीत। भविष्य का सुकुन। सुख और खुशियों के अनमोल पल। विरासतों के पन्ने सकल। किन्तु, निकालता है,निकलते हैं सिर्फ दुःख की कहानियाँ। अनजानी, अचीन्ही दुनियाँ। ------------------------------------17726
गाँव में रुआँसा गाँव -------------------------------------------------------- प्रयोगशाला है गाँव मनुवाद का सामंतवाद का। बड़ा अभाव है जी समरस मानवीय संवाद का। जातियों में बँटी हुई सारी ही आबादी है। भेदभाव में जीने की यह आबादी आदी है।
आदमी से बहुत बड़ा कुल,गोत्र की है धमक। फीके पड़े हुए हैं यहाँ आर्थिक या शैक्षिक चमक। रास्तों पर चलने का नियम तक जारी है, पोखर से पानी तक का, चाहे सरकारी है।
समाज में श्रेष्ठता का मानक तक जाति है। मान्य है गुण जैसा कहते संस्कार की भाँति है। क्षुद्रता की पराकाष्ठा को मिली देखें श्रेष्ठता है। दुर्जनता कितनी! गिरी कैसी और धृष्टता है।
धर्मांधतता,जातिगतता कुंठा बन गुम्फित है। कर्म से परिवर्तन का द्वार अभी तो बाधित है। हक की मनुवादिता हठ करके डटी हुई। तथा सामंतवादिता की हक है रटी हुई।
कैसा और कितना परिवर्तन सब गाते हैँ। मुटठी में बाँध कर आसमाँ दिखलाते हैं। खुला पड़ा गाँव का आसमाँ यूँ रोता है। शासन,प्रशासन को कुछ क्यों न होता है? -----------------------------------------------24726
थोड़े से दिन ---------------------------- थोड़े से दिन जीने के लिए मिले। थोड़े से दिन सुस्ताने के लिए। जूझते हुए अंधेरे से, सारे बीत गये। जो प्रकाश लेकर होते हैं पैदा जो हाथों में लकीरें लेकर होते हैं पैदा मैं क्यों नहीं? रिक्त पैदा होना प्राराब्धिक है या सामाजिक। ऊहापोह में रहो मत जीने का हक बनाओ आधिकारिक। मोह में पड़ो मत उठाओ गाँडीव। -----------------------------------------9726
दुःख का अभिशाप --------------------------------- लोग जानते हैं कि दुःख है। दुःख का कारण भी जान जाते हैं लोग। कारण का निवारण भी जानते हैं लोग। निवारण की सारी क्रियाएँ तक जानते हैं लोग। क्रियाओं के निर्धारण की विधि और निष्पादन के कला व विज्ञान भी।
संलग्न होते रहे हैं लोग अति उत्साह,उमंग से सुख भोगने और सुख अपना बढ़ाने में। हमारा दुःख इस तरह अभिशप्त है होते रहने के लिए। वस्तुतः हर दुःख को किसी सुख का अभिशाप है। ----------------------------------------------17726
मन्दिर खाली कर ----------------------------------- मन्दिर खाली कर देवता संज्ञान खो गया। स्वर्ग-नरक का धर्म-कर्म का ज्ञान खो गया।
पत्थर का जाया पत्थर का है प्राण खो गया। मिथ्या था वरदान,खो गया। भक्तों का कल्याण खो गया। मन्दिर खाली कर मन्दिर का हर ध्यान खो गया।
पूजा,हवन,यज्ञ के पोल खुल गये। मंत्र,प्रार्थना,अनुष्ठानों के घोल घुल गये। दीपक लौ से हीन हो गये। घंटों के स्वर दीन हो गये। मन्दिर खाली कर देवों का जयगान खो गया।
याचक बन बैठा है ईश्वर। सिद्ध,पुजारी पक्के नटवर। पूजा सब अपभ्रंश हो गये। दाताओं के अंश हो गये। मन्दिर खाली कर ठगा हुआ यजमान हो गया।
सत्ता का संरक्षक मंदिर। विधि भ्रष्ट आचरण अस्थिर। राजाओं के भोग उजागर। पुरोहितों के झूठ उजागर। मन्दिर खाली कर आस्था ङै बिल्कुल निष्प्राण हो गया। मन्दिर खाली कर शिला कठोर भगवान हो गया। ---------------------------------------------.27726
बिना माप का रास्ता ------------------------ मुझे जब चुनना था मैंने मनमाने ढँग से कुछ ऩहीं चुना। मेरे रास्ते का पता मेरे पास कुछ और था मैंने खुद को किसी और रास्ते पर चलता पाया। नहीं बदल सकता था रास्ता। करने से प्रयास ऱास्ता ही खो जाना था।
रास्ता मेरे अस्तित्व में तय नहीं था। मेरा अस्तित्व रास्ते में तय था। मैं चलने के लिए सारा उम्र इसलिए रास्ते पर रास्ता खोजने भटकता रहा।
मैं अपने-होने की राह पर न चल पाया। बस होते-रहने के रास्ते पर चला किया। बहुत सारे विकल्पों में होते रहे हैं रास्ते। रास्ते पर चलते हुए कोई विकल्प नहीं होता। रूको गढ़ो चलो और पा लो। कुछ लोग सिर्फ खोते रहते हैं। मेरा आकलन संसार करे मंजूर नहीं मुझे। संसार कितना मिला य़ह आकलन है करना,बताना। रास्ता बाकी है या चलना। ------------------------------------------9826
वाद दायर है ------------------------------------- मन के कोख में घृणा और क्रोध है मैं जन्म देना चाहता हूँ। मुझे भूख का शुद्ध डर है। अर्थतः हाशिये का जातक हूँ। बहादुरी करना मना है।
घृणा और क्रोध क्या उगल सकता है! विरोध,विद्रोह और आंदोलन। यह उसका कर्तव्य है और धर्म भी। क्या वह-मैं- कायर है? यहाँ वाद दायर है। ----------------------2826
स्त्री जब मैंने तुम्हें -------------------------------------- स्त्री जब मैंने तुम्हें जाना तुम स्त्री थी। नहीं थी तुम ईश्वर की रचना। तुम ईश्वर को रचने की कर रही थी तैयारी। उसका स्वरूप और स्वभाव, उसका मानवीय और राक्षसी सामग्री।
एक सत्ता से दूसरी सत्ता को हस्तांतरित हुई स्त्री व्यक्तित्व में तुम्हारे उभर आई थी सत्ता। सत्ता का संघर्ष। आलोचना नहीं प्रशंसा नहीं। एक नीयत के विरुद्ध कठोरता का आभरण।
तुम श्रृंगार के लिए अंगार बनती हुई स्त्री। तुम भविष्य के भय से थी आक्रांत। सत्ताधारियों का जन्मजात डर। श्रृंगार सौन्दर्य नहीं सत्ता का ऐश्वर्य है। स्त्री जब मैंने तुम्हें जाना तुम स्त्री थी।
एक देहरी से निकलकर दूसरी देहरी पार करते ही नारी को स्त्री की परिपक्वता में देखा मैंने। स्त्री जब मैंने तुम्हें जाना तुम स्त्री थी। -------------------------------------------------------2826
अछूत
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श्वेद का, जीया हुआ जीवन होता है।
स्पर्श किये हुए वायु में कर्म का सुगंध होता है।
श्रम की कहानियाँ,किस्से,कौशल और पराक्रम
सृष्टि का कायम रखती है प्रवाह।
शीतल मन से तातल तन से क्षुधित विश्व का
रखता आया एक वही परवाह।
विस्तृत गगन पर हमारा सूर्य
जोहता रहा बाट
तुम्हारी तलवार वाली किताबें
कब करे बंद अपने पृष्ठ।
पर, बेहुदा खोल रखता है पलकों के नीचे
मेरी रोटी गोल न बने यह देखने।
व्यवस्थित न होने देना जिस कौम की नीयत है
समाज का वह हिस्सा अछूतेपन के कोढ़ से ग्रस्त
पतनोन्मुख हो,यह वरदान है।
अछूत कविताएँ बोलने आयी है
बोलें
अपने अछूतेपन को कुचलें।
कानून, व्यवस्था के लिए कायम हुई है
रखवालों का इसे बपौती मान लेना
अव्यवस्था को कायम करना है।
जैसे अछूत को अछूत रखने की कवायद।
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बड़ा हो जाना छोटी उम्र में
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बड़ा हो जाना छोटी उम्र में।
मरते रहना है तमाम वक्त।
आक्रमण करते रहना है
उम्र के खण्ड-खण्ड अस्तित्व पर
क्रोध के शस्त्रागार से निकले घृणा से।
छोटी उम्र में हासिल कर लेना बड़ों का सच
अपना सच खो देना है।
छोटी सी उम्र में बड़े दरख्तों को
काटने कुल्हाड़ी से हो जाना प्रस्तुत
डरकर क्षुधा से मेरा बड़ा हो जाना है।
छोटी उम्र में मुझे बनने देना बड़ा
है सारी जिन्दगी मुझे छोटा रखने का षडयंत्र।
सामाजिक संवेदनाओं का अभाव सभ्यता का बौनापन है
यह बौनापन छीनता रहा है तमाम उम्र
मेरी उम्र।
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आलमारी
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लोग खरीदते हैं
लोहे की मजबूत अलमारियाँ।
सहेज कर रखने के लिए
वर्तमान का अतीत।
भविष्य का सुकुन।
सुख और खुशियों के अनमोल पल।
विरासतों के पन्ने सकल।
किन्तु, निकालता है,निकलते हैं
सिर्फ दुःख की कहानियाँ।
अनजानी, अचीन्ही दुनियाँ।
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गाँव में रुआँसा गाँव
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प्रयोगशाला है गाँव मनुवाद का सामंतवाद का।
बड़ा अभाव है जी समरस मानवीय संवाद का।
जातियों में बँटी हुई सारी ही आबादी है।
भेदभाव में जीने की यह आबादी आदी है।
आदमी से बहुत बड़ा कुल,गोत्र की है धमक।
फीके पड़े हुए हैं यहाँ आर्थिक या शैक्षिक चमक।
रास्तों पर चलने का नियम तक जारी है,
पोखर से पानी तक का, चाहे सरकारी है।
समाज में श्रेष्ठता का मानक तक जाति है।
मान्य है गुण जैसा कहते संस्कार की भाँति है।
क्षुद्रता की पराकाष्ठा को मिली देखें श्रेष्ठता है।
दुर्जनता कितनी! गिरी कैसी और धृष्टता है।
धर्मांधतता,जातिगतता कुंठा बन गुम्फित है।
कर्म से परिवर्तन का द्वार अभी तो बाधित है।
हक की मनुवादिता हठ करके डटी हुई।
तथा सामंतवादिता की हक है रटी हुई।
कैसा और कितना परिवर्तन सब गाते हैँ।
मुटठी में बाँध कर आसमाँ दिखलाते हैं।
खुला पड़ा गाँव का आसमाँ यूँ रोता है।
शासन,प्रशासन को कुछ क्यों न होता है?
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थोड़े से दिन
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थोड़े से दिन जीने के लिए मिले।
थोड़े से दिन सुस्ताने के लिए।
जूझते हुए अंधेरे से, सारे बीत गये।
जो प्रकाश लेकर होते हैं पैदा
जो हाथों में लकीरें लेकर होते हैं पैदा
मैं क्यों नहीं?
रिक्त पैदा होना
प्राराब्धिक है या सामाजिक।
ऊहापोह में रहो मत
जीने का हक बनाओ आधिकारिक।
मोह में पड़ो मत
उठाओ गाँडीव।
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दुःख का अभिशाप
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लोग जानते हैं कि दुःख है।
दुःख का कारण भी जान जाते हैं लोग।
कारण का निवारण भी जानते हैं लोग।
निवारण की सारी क्रियाएँ तक जानते हैं लोग।
क्रियाओं के निर्धारण की विधि
और निष्पादन के कला व विज्ञान भी।
संलग्न होते रहे हैं लोग अति उत्साह,उमंग से
सुख भोगने और सुख अपना बढ़ाने में।
हमारा दुःख इस तरह अभिशप्त है
होते रहने के लिए।
वस्तुतः हर दुःख को किसी सुख का अभिशाप है।
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मन्दिर खाली कर
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मन्दिर खाली कर
देवता संज्ञान खो गया।
स्वर्ग-नरक का धर्म-कर्म का
ज्ञान खो गया।
पत्थर का जाया
पत्थर का है प्राण खो गया।
मिथ्या था वरदान,खो गया।
भक्तों का कल्याण खो गया।
मन्दिर खाली कर
मन्दिर का हर ध्यान खो गया।
पूजा,हवन,यज्ञ के पोल खुल गये।
मंत्र,प्रार्थना,अनुष्ठानों के घोल घुल गये।
दीपक लौ से हीन हो गये।
घंटों के स्वर दीन हो गये।
मन्दिर खाली कर
देवों का जयगान खो गया।
याचक बन बैठा है ईश्वर।
सिद्ध,पुजारी पक्के नटवर।
पूजा सब अपभ्रंश हो गये।
दाताओं के अंश हो गये।
मन्दिर खाली कर
ठगा हुआ यजमान हो गया।
सत्ता का संरक्षक मंदिर।
विधि भ्रष्ट आचरण अस्थिर।
राजाओं के भोग उजागर।
पुरोहितों के झूठ उजागर।
मन्दिर खाली कर
आस्था ङै बिल्कुल निष्प्राण हो गया।
मन्दिर खाली कर
शिला कठोर भगवान हो गया।
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बिना माप का रास्ता
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मुझे जब चुनना था
मैंने मनमाने ढँग से कुछ ऩहीं चुना।
मेरे रास्ते का पता मेरे पास कुछ और था
मैंने खुद को किसी और रास्ते पर चलता पाया।
नहीं बदल सकता था रास्ता।
करने से प्रयास ऱास्ता ही खो जाना था।
रास्ता मेरे अस्तित्व में तय नहीं था।
मेरा अस्तित्व रास्ते में तय था।
मैं चलने के लिए सारा उम्र इसलिए
रास्ते पर रास्ता खोजने भटकता रहा।
मैं अपने-होने की राह पर न चल पाया।
बस होते-रहने के रास्ते पर चला किया।
बहुत सारे विकल्पों में होते रहे हैं रास्ते।
रास्ते पर चलते हुए कोई विकल्प नहीं होता।
रूको गढ़ो चलो और पा लो।
कुछ लोग सिर्फ खोते रहते हैं।
मेरा आकलन संसार करे मंजूर नहीं मुझे।
संसार कितना मिला य़ह आकलन है
करना,बताना।
रास्ता बाकी है या चलना।
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वाद दायर है
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मन के कोख में घृणा और क्रोध है
मैं जन्म देना चाहता हूँ।
मुझे भूख का शुद्ध डर है।
अर्थतः हाशिये का जातक हूँ।
बहादुरी करना मना है।
घृणा और क्रोध क्या उगल सकता है!
विरोध,विद्रोह और आंदोलन।
यह उसका कर्तव्य है और धर्म भी।
क्या वह-मैं- कायर है?
यहाँ वाद दायर है।
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स्त्री जब मैंने तुम्हें
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स्त्री जब मैंने तुम्हें जाना तुम स्त्री थी।
नहीं थी तुम ईश्वर की रचना।
तुम ईश्वर को रचने की कर रही थी तैयारी।
उसका स्वरूप और स्वभाव,
उसका मानवीय और राक्षसी सामग्री।
एक सत्ता से दूसरी सत्ता को हस्तांतरित हुई स्त्री
व्यक्तित्व में तुम्हारे उभर आई थी सत्ता।
सत्ता का संघर्ष।
आलोचना नहीं प्रशंसा नहीं।
एक नीयत के विरुद्ध कठोरता का आभरण।
तुम श्रृंगार के लिए अंगार बनती हुई स्त्री।
तुम भविष्य के भय से थी आक्रांत।
सत्ताधारियों का जन्मजात डर।
श्रृंगार सौन्दर्य नहीं सत्ता का ऐश्वर्य है।
स्त्री जब मैंने तुम्हें जाना तुम स्त्री थी।
एक देहरी से निकलकर दूसरी देहरी पार करते ही
नारी को स्त्री की परिपक्वता में देखा मैंने।
स्त्री जब मैंने तुम्हें जाना तुम स्त्री थी।
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