गजल
जितने शव थे मैंने ढ़ोए,और कफन ले गए वे।
जितनी मौतें हैं मरा किए हम,दफन हो गए वे।
ऊपर और ऊपर,इस ऊपर की कोई सीमा है क्या।
इश्तहार की जगह चिपके हम और वतन हो गए वे।
आपके वायदे तमाम शिकवा हुए जान सका तब ।
कि आप सत्ताविरोधी सत्ता हेतु थे जब कफन हो गए वे।
सुवास उठा है तो हर सर झुका है जमीन तक गुल के लिए।
बदन मेरा फूलों के लिए क्यारियाँ बने और चमन हो गए वे।
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