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Showing posts from June, 2022
  नेता ----------------------------- शब्दों का संसार उठाकर   ले तो आऊँगा मैं। पूछो मुझसे किन्तु , क्या-क्या दे जाऊँगा मैं। आशाओं का विशद ‘ लिस्ट ’ जो कभी न पूरा होना है। प्रजातंत्र से तंत्र हटाकर तुमको दु:ख दे जाऊँगा मैं। हर प्रहार जो तुमपर होगा उफ् तक नहीं करूँगा मैं। पूछो मुझसे किन्तु , क्या-क्या   दे जाऊँगा मैं। समय तुम्हें बूढ़ा कर देगा , हर रग में पीड़ा भर देगा। मैं मुस्काऊँगा कवि हूँ मैं   एवम् तुम्हें लिखूँगा मैं। हर जुबान से झूठ कहूँगा हर सच को आँखें तरेर कर। अर्जदार तुम , अर्जी तेरी कभी , कभी न पढ़ूँगा मै। पूनम को भी बना अमावस तुमको तो सौंपूँगा मैं। शब्दों का संसार उठाकर तुमको तो दे जाऊँगा मैं। जातिवाद भी मैं ही दूँगा मैं ही दूँगा सामन्तवाद। मैं नेता हूँ धर्म , कर्म का आग तुम्हें सौंपूँगा मैं। श्रृँख़लाओं से भर दूँगा व्यथा , दर्द , पीड़ा से तुमको मैं ही इसे सृजन करता हूँ तेरा अश्रुकण देखूँगा मैं।   युद्ध की पीड़ा , शांति की हिंसा रोज उगाता आया हूँ। तुमको भोग लगाऊँगा। तेरा मन विचलित कर पाऊँ तब नेता कहलाऊंगा। ...
  हंसा हुआ दु ; ख -------------------------------------------------- वह हंसा , हँसते-हँसते रो गया अपनी व्यथा। पूरे संसार में , दु:ख झेलने की यही है प्रथा। क्यों रोते हो पूछ गया दुखी मन। हृदय के आघात दिखाकर सुखी हो गया पीड़ित तन।          ------------------------------------------------------ अरुण कुमार प्रसाद/19/6/22