कौन सा सच! -------------------------------------------- कौन सा सच जिंदा रहा है इस जहान में ? कितने ही सारे सच दफन हैं हर मकान में। उल्लू की आँख है ये सच बोलता नहीं। है दफन सारे ही सच झूठे शान-बान में। सच पे टिके रह के जरा देखिये जनाब। होंगे ही दफन आप अपने गिरेबान में। हुस्न उनका सच नहीं है मान लीजिये। जिंदा ही दफन देते कर गीता-कुरान में। सच है जरूर आपके और मेरे पास भी। सच है कि ये टंगा हुआ है आसमान में। काश! कि सच माँएँ होती स्नेह साथ ले। सच को बचाए रखती आँचल के छांव में। सच को कुचलने लोग घरों से निकल रहे। व करने दफन बेताब हैं कहीं श्मशान में। सच की उमर अनन्त है शक है नहीं कोई। शव सा पड़ा रहता है काजी के दुकान में। कड़वा है सच पूछिए कि पी सकेंगे आप ? और आप उगल देना न उनके पीकदान में। आइए लेंगे क्या सच कहने की हर कसम। व होंगे नहीं दफन कभी इस दरम्यान में। ---------------------------------------------------- अरुण कुमार प्रसाद
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आत्मकथा दंगे की ------------------------- सृष्टि के साथ जन्मा नहीं मैं। ईश्वर नहीं है मेरा पिता। मनुष्य सभ्य होने लगा तब मैं लेने लगा बीजरूप। मनुष्य के संस्कार में जब अहंकार करने लगा घर तब होने लगा मेरा जन्म। मेरा भ्रूण शोषण के विरोध में चीख , चीत्कार के दु:खित शब्दों के स्पंदन से विकसित होता रहा। मेरा अस्तित्व आक्रोश और गुस्से के लहू पीता रहा । फिर मनुष्य के मष्तिष्क में गाढ़ निद्रा में सोता रहा। जीवन में वर्चस्व की असत्य महत्ता का वार्तालाप के वाक्य सुनता हुआ सोता रहा ‘ प्लेसेन्टा ’ में लिपटा हुआ। आदमी के शैशव में आदमजात मैं विस्मृत स्मृतियों को जिया। बालपन में छीना-झपटी सीखा। स्कूलों में गुरु की आज्ञा अनुशासन की तरह किताबों के शब्दों में अनजाने दंगा का ‘ द ’ रटा। जंगल मनुष्य के मन में रच-बस जाता है। दंगे होने से रचा-बसा वह जंगल हो जाता है प्रकट। चेतना में पारिस्थिक दंगापन पृथ्वी पर टूटे पहाड़ों के दरके चट्टानों सा रहता है बिखरा पड़ा। अप्रमाणित रस्म , रिवाजों में दंभयुक्त आवाजों में पनप लेना मेरा स्वभाव है। सभ्यता...